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57 वर्षीय पुरुष की क्रिकेट रीरन देखने की जुनूनी आदत और उसके पारिवारिक जीवन पर प्रभाव

मैं 57 वर्षीय पुरुष हूँ और पिछले 30 वर्षों से एक कारखाने में फोरमैन के रूप में काम कर रहा हूँ। मेरी शादीशुदा ज़िंदगी सामान्य है, लेकिन पिछले 10 सालों से मुझे एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। मैं हर दिन शाम को काम से लौटने के बाद लगभग 4-5 घंटे तक टेलीविजन पर क्रिकेट के पुराने मैचों के रीरन देखता रहता हूँ, खासकर 1983 और 2007 के वर्ल्ड कप मैच। मैं उन्हें बार-बार देखता हूँ, कमेंट्री को याद करता हूँ, और अपने परिवार को भी उनके बारे में बताता रहता हूँ। मेरी पत्नी और बच्चे (अब बड़े हो चुके हैं) मुझसे नाराज़ हैं क्योंकि मैं उनके साथ समय नहीं बिताता, घर के कामों में मदद नहीं करता, और सोशल गैदरिंग से भी दूर रहता हूँ। मैं रात में देर तक जागकर यह सब करता हूँ, जिससे मेरी नींद पूरी नहीं होती और काम पर थकान रहती है। मैं जानता हूँ कि यह सही नहीं है, लेकिन जब भी मैं इसे देखने की कोशिश नहीं करता, तो मुझे बेचैनी होती है और लगता है कि कुछ महत्वपूर्ण छूट रहा है। क्या यह एक तरह की लत है? क्या उम्र के इस पड़ाव पर इस तरह की आदत सामान्य है? मैं इस चक्र से कैसे बाहर निकल सकता हूँ और अपने परिवार के साथ संबंधों को फिर से कैसे मजबूत कर सकता हूँ?

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मनोवैज्ञानिक और एआई

एक मध्यम आयु वर्ग के व्यक्ति को देर रात पुराने क्रिकेट मैच देखते हुए दिखाया गया है, जबकि पृष्ठभूमि में उसका परिवार अलग-थलग दिख रहा है, जो आदत और पारिवारिक जीवन के बीच के तनाव को दर्शाता है।

मैं आपकी हालात समझ सकती हूँ और सबसे पहले यह कहना चाहूंगी कि आप अकेले नहीं हैं जिनके जीवन में कोई दृढ़ आदत परिवार और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों पर असर डालती है, मैं चिकित्सक नहीं हूँ इसलिए किसी नैदानिक लेबल के साथ तुरंत परामर्श नहीं दे सकती, परन्तु आपकी आदत लत जैसा व्यवहार महसूस हो सकती है क्योंकि इसे छोड़ने पर बेचैनी होती है और यह आपके दिनचर्या तथा नींद को प्रभावित कर रहा है।

इस व्यवहार के पीछे आमतौर पर कुछ कारण होते हैं जैसे रूटीन और सांत्वना जिसे पुरानी यादें देती हैं, काम के बाद आराम पाने की जरूरत, तनाव या अकेलेपन की भावनाएँ, और आदत का वर्षों में बन जाना। यह जानना उपयोगी है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी व्यक्ति पुरानी आदतों से प्रभावित हो सकता है और यह बिल्कुल असामान्य नहीं है कि किसी विशेष समय या विषय से जुड़ी स्मृतियाँ और रस्सी मजबूत बने रहें।

व्यावहारिक कदमों में सबसे पहले अपनी दिनचर्या पर नजर रखें और खुद को आंकने का एक सरल तरीका अपनाएँ, जैसे आप कितने समय तक देख रहे हैं और किस समय में यह सबसे ज़्यादा होता है। फिर सीमा तय करें जैसे शाम के दर्शनीय समय के लिए एक कठोर सीमा रखें और टीवी के लिए टाइमर लगाएँ, साथ ही काम से लौटकर पहले ताजगी के लिए थोड़ी सैर या स्ट्रेचिंग शामिल करें ताकि सीधे दर्शनीय कला में न उलझें। नींद की कमी के लिए नींद की गुणवत्ता सुधारें, स्क्रीन टाइम सोने से कम से कम एक घंटा पहले बंद करें, और सोने का एक स्थिर समय निर्धारित करें।

परिवार के साथ रिश्ते सुधारने के लिए सबसे जरूरी है खुलकर बातचीत जिसका उद्देश्य दोषारोपण नहीं बल्कि समझ बनाना हो। अपनी पत्नी और परिवार को यह बताइए कि यह आपके लिए क्या मायने रखता है और उनसे भी पूछिए कि वे कौन सा समय और गतिविधियाँ पसंद करेंगे, फिर छोटे व्यवहारिक परिवर्तन करें जैसे सप्ताह में कुछ चुने हुए शामें परिवार को समर्पित करना, घर के कामों में नियमित छोटे योगदान देना, और कोई साझा गतिविधि शुरू करना जिसे आप सभी पसंद करें। कभी कभी सिर्फ एक साथ बात करना और छोटे वादे निभाना रिश्तों में बड़ा फर्क कर देता है।

आदत बदलने की रणनीति धीरे-धीरे घटाएं के सिद्धान्त पर काम करती है, उदाहरण के लिए हर सप्ताह 30 से 60 मिनट कम कर दें और खाली समय में किसी प्रतिस्थापन गतिविधि को रखें जैसे शॉर्ट वॉक, किताब पढ़ना, हौबी, या परिवार के साथ बातचीत। छोटे लक्ष्य तय करें और उनकी सफलता पर खुद को मान्यता दें। अगर आप पहले से ही रात में देर तक जागते हैं तो धीरे धीरे सोने का समय आगे बढ़ाएँ ताकि आपकी ऊर्जा भी बढ़े और काम पर थकान कम हो।

यदि आप महसूस करें कि बिना कार्यक्रम के आप बहुत अधिक बेचैनी, चिड़चिड़ापन या काम पर बाधा का सामना कर रहे हैं, तो किसी प्रशिक्षित काउंसलर या मनोवैज्ञानिक से समर्थन लेना फायदेमंद हो सकता है क्योंकि वे व्यवहारिक तरीके सीखने में मदद करते हैं, मैं मनोरोगीय निदान नहीं कर रही हूँ पर पेशेवर मार्गदर्शन आपको रणनीतियाँ और परिवार के साथ संवाद के व्यावहारिक तरीके दे सकता है।

अंततः, बदलाव छोटे कदमों से आता है, अपने आप पर कठोर न हों, परिवार के साथ स्पष्ट और सहज संवाद बनाएँ, और लगातार छोटे व्यवहारिक बदलावों पर ध्यान दें, समय के साथ आप अपनी शामों और रिश्तों में संतुलन ला सकेंगे।

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