मनोवैज्ञानिक और एआई
आराधना, तुमने बहुत बहादुरी से अपनी भीतरी दुनिया साझा की है। यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। तुम जो महसूस कर रही हो, वह आत्म-संदेह का एक ऐसा चक्र है जो कई प्रतिभाशाली और संवेदनशील लोगों को प्रभावित करता है-खासकर उनमें जो बाहर से मजबूत दिखते हैं लेकिन अंदर से खुद को कड़ाई से आंकते हैं। तुम अकेली नहीं हो। यह डर और चिंता वास्तव में तुम्हारी गहरी जिम्मेदारी की भावना और उत्कृष्टता की इच्छा का ही एक विकृत रूप है। चलो, इसे समझने और इससे निकलने के रास्ते तलाशते हैं।
पहले यह समझो कि तुम जो ‘अयोग्यता का भ्रम’ (Impostor Syndrome) महसूस कर रही हो, वह एक आम मनोवैज्ञानिक पैटर्न है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं-जैसे बच्चों को souvent ‘परफेक्ट’ होने का दबाव, तुलना की संस्कृति, या सफलता को ‘अच्छाई’ से जोड़ देना। तुम्हारे माता-पिता का प्यार और अपेक्षाएं भी, बिना उनके इरादे के, तुम्हें यह एहसास दिला सकती हैं कि तुम्हें हर पल ‘साबित’ करना है। लेकिन सच्चाई यह है कि तुम्हारी कीमत तुम्हारी उपलब्धियों से नहीं, तुम्हारी मौजूदगी से है। तुम पहले से ही पर्याप्त हो-गलतियों, डरों और असुरक्षा के साथ।
इस आत्म-संदेह के चक्र को तोड़ने के लिए, छोटे-छोटे लेकिन गहरे बदलावों की जरूरत है। सबसे पहले, अपने विचारों को पहचानो और चुनौती दो। जब तुम खुद को कहो, ‘मैं पर्याप्त अच्छी नहीं हूँ,’ तो पूछो: ‘इस विचार का कोई ठोस सबूत क्या है?’ अधिकतर, तुम पाओगी कि यह सिर्फ एक आदतन नकारात्मक स्क्रिप्ट है,事实 नहीं। अपने आप से बात करते समय, जैसे तुम किसी प्यारे दोस्त से करोगी-कोमलता और धैर्य से। उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी परीक्षा में कम अंक लाती हो, तो खुद को कहो: ‘हाँ, यह अपेक्षा से कम है, लेकिन इससे मैं क्या सीख सकती हूँ?’ बजाय ‘मैं असफल हूँ’ के।
दूसरा, गलतियों को सीखने के अवसरों में बदलो। डर का एक बड़ा कारण यह है कि तुम गलतियों को ‘विफलता’ समझती हो, जबकि वास्तव में वे वृद्धि के संकेत हैं। हर बार जब तुम कोई ‘गलती’ करो, लिखो कि इससे तुमने क्या सीखा और अगली बार क्या अलग करोगी। यह अभ्यास तुम्हारी सोच को ‘स्थिर’ (Fixed Mindset) से ‘विकसित’ (Growth Mindset) की ओर ले जाएगा। याद रखो, जो लोग कभी गलती नहीं करते, वे शायद कभी कुछ नया करने की हिम्मत नहीं करते।
अब, सबसे कठिन लेकिन सबसे मुक्तिदायक कदम: माता-पिता से बात करना। तुम उन्हें निराश करने से नहीं, बल्कि उन्हें तुमसे जुड़ने का मौका देने से डर रही हो। शुरुआत करने के लिए, कोई ऐसा पल चुनो जब वे शांत और उपलब्ध हों। तुम कह सकती हो, ‘मम्मा-पापा, मैं जानती हूँ कि आप मुझे बहुत मजबूत समझते हैं, और मैं वास्तव में आपकी बेटी होने पर गर्व करती हूँ। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं अपने डर और चिंताओं को आपके साथ शेयर नहीं कर पाती, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आप मुझसे निराश हों। क्या हम इस बारे में बात कर सकते हैं?’ इस तरह की शुरुआत उन्हें यह समझने में मदद करेगी कि तुम उनकी स्वीकृति नहीं, उनकी समझ चाहती हो।
अगर तुम्हें लगता है कि सीधे बात करना मुश्किल है, तो पत्र लिखने का विकल्प आजमा सकती हो। उन्हें एक चिट्ठी लिखो जिसमें तुम अपने डर, अपेक्षाएं और उनकी भूमिका के बारे में बात करो। इससे तुम्हें अपनी भावनाओं को व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी, और उन्हें भी समय मिलेगा कि वे तुम्हारे शब्दों को समझें और सोच-समझकर प्रतिक्रिया दें। कई बार, माता-पिता को भी नहीं पता होता कि उनके बच्चे इतनी गहराई से संघर्ष कर रहे हैं-वे बस तुम्हें खुश और सफल देखना चाहते हैं।
इसके अलावा, छोटे जोखिम उठाना शुरू करो। डर के कारण तुम नई चीजों से बच रही हो, जो तुम्हारे आत्मविश्वास को और कमजोर कर रहा है। हर हफ्ते एक छोटा सा कदम उठाओ-जैसे किसी नए क्लब में शामिल होना, क्लास में एक सवाल पूछना, या कोई नई स्किल सीखना। हर बार जब तुम ऐसा करती हो, तुम्हारा दिमाग समझता है कि डर का परिणाम हमेशा बुरा नहीं होता। धीरे-धीरे, यह अनुभव तुम्हें अधिक सशक्त बनाएगा।
अंत में, अपने आप को स्वीकार करना सीखो। तुम एक ऐसी लड़की हो जो प्यार करने लायक है-न केवल अपने काम के लिए, बल्कि अपने डर, अपूर्णताओं और संवेदनशीलता के लिए भी। जब तुम खुद को पूरी तरह से स्वीकारोगी, तब बाहरी स्वीकृति की तलाश कम हो जाएगी। याद रखो, मजबूती का मतलब डर न होना नहीं, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ना है। तुम पहले से ही बहुत बहादुर हो-क्योंकि तुमने अपने डर को पहचाना है और उससे लड़ने की इच्छा रखती हो।
यदि कभी लगाए कि यह सब बहुत भारी हो रहा है, तो किसी पेशेवर मनोवैज्ञानिक से बात करने में संकोच मत करो। यह तुमारी कमजोरी नहीं, बल्कि तुम्हारी ताकत होगी-क्योंकि मदद मांगना खुद को महत्व देना है। तुम इस डर के चक्र से बाहर निकलोगी, और जब ऐसा होगा, तुम पाओगी कि तुम जो चाहती हो, वह सब हासिल करने की शक्ति तुममें पहले से है।