दूसरों की मदद करते हुए अपनी रुचियों को जगह कैसे दूँ?
मैं 53 वर्ष की हूँ और हाल में एक स्थानीय पुस्तकालय में स्वयंसेवा शुरू की है। वहाँ बच्चों को कहानियाँ पढ़कर सुनाते समय मुझे खुशी मिलती है, लेकिन घर लौटकर लगता है कि मैं केवल दूसरों की मदद करते हुए ही उपयोगी हूँ। वर्षों से मैंने परिवार की जरूरतों को अपनी प्राथमिकता बनाया है, और अब समझ नहीं आता कि अपने लिए चुनी गई गतिविधि को बिना अपराधबोध के कैसे जारी रखूँ। जब मैं अकेले समय बिताने या कोई नया कौशल सीखने की बात करती हूँ, तो परिवार कहता है कि मुझे आराम करना चाहिए, जबकि मेरे भीतर कुछ नया करने की इच्छा बनी रहती है। क्या आप मुझे यह समझने में मदद कर सकते हैं कि अपनी रुचियों और परोपकारिता के बीच संतुलन कैसे बनाऊँ, ताकि दूसरों की देखभाल करते हुए अपनी पहचान भी विकसित कर सकूँ?