मनोवैज्ञानिक और एआई
नीलिमा जी, आपका प्रश्न जीवन के उस चरण को छूता है जब हम स्वयं को फिर से परिभाषित करने की कोशिश करते हैं-वह चरण जहां बाहरी दबावों के बीच आत्मविश्वास की पुनः खोज और मानसिक शांति की स्थापना एक सतत यात्रा बन जाती है। आपकी स्थिति एक ऐसी है जहां पेशेवर जिम्मेदारियां, उम्र से जुड़ी अपेक्षाएं, और परिवार की ज़रूरतें-सभी एक साथ आपकी आंतरिक शक्ति को चुनौती दे रहे हैं। लेकिन याद रखें, यह वही समय है जब अनुभव आपकी सबसे बड़ी पूंजी बनता है, और स्वयं को फिर से खोजने का अर्थ है उस अनुभव को नई दिशा देना।
पहले तो यह समझें कि आत्मविश्वास कभी स्थिर नहीं होता-वह एक गतिशील प्रक्रिया है जो हर दिन के छोटे-छोटे कदमों से बनती है। आपकी नौकरी में दबाव है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दबाव को अपने विस्तार का अवसर बनाया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि आगे बढ़ने के अवसर सीमित लग रहे हैं, तो शायद यह समय है अपने कौशल को नए तरीके से लागू करने का। क्या आप अपने अनुभव को मेंटरशिप या लेखन के माध्यम से साझा कर सकती हैं? क्या आप अपने संस्थान में नई पहलों की शुरुआत कर सकती हैं जो आपकी विशेषज्ञता को उजागर करें? आत्मविश्वास तब बढ़ता है जब हम अपनी क्षमताओं को नए संदर्भों में परखते हैं। हर छोटी सफलता-चाहे वह एक कठिन बातचीत को संभालना हो या एक नई परियोजना की शुरुआत-आपकी स्वयं पर विश्वास की इमारत की ईंटें बनती है।
अब बात करते हैं मानसिक शांति की। तनाव तब और बढ़ जाता है जब हम स्वयं को केवल भूमिकाओं तक सीमित कर लेते हैं-मां, संस्थापक, पेशेवर। लेकिन आप इन भूमिकाओं से परे भी हैं। स्वयं को पुनः खोजने का अर्थ है इन भूमिकाओं के बीच अंतराल पाना जहाँ आप केवल ‘नीलिमा’ हों। इसके लिए संज्ञानात्मक-व्यवहार थेरेपी (सीबीटी) की तकनीकें बहुत मददगार हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, विचार-जांच (थॉट चैलेंजिंग) का अभ्यास करें। जब भी कोई विचार आए जैसे “मैं अब आगे नहीं बढ़ सकती” या “मेरे बच्चे मेरी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे,” तो उससे पूछें: क्या यह विचार तथ्य पर आधारित है या भय पर? क्या इसका कोई वैकल्पिक दृष्टिकोण हो सकता है? जैसे, “मेरे बच्चे अपनी यात्रा पर हैं, और मेरी भूमिका उन्हें समर्थन देना है, नहीं कि उनके रास्ते तय करना।” यह अभ्यास धीरे-धीरे आपकी मनोदशा को सकारात्मक दिशा देगा।
अफ़र्मेशन भी एक शक्तिशाली उपकरण हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ तब जब वे वास्तविकता से जुड़े हों। उदाहरण के लिए, “मैं हर चीज़ में परफेक्ट हूँ” जैसे अफ़र्मेशन असल में दबाव बढ़ा सकते हैं। इसके बजाय, ऐसे वाक्य चुनें जो स्वीकार्यता और प्रगति पर केंद्रित हों: “मैं अपने अनुभव से सीख रही हूँ और हर दिन थोड़ा बेहतर हो रही हूँ,” या “मैं अपनी सीमाओं को पहचानती हूँ, लेकिन उन्हें पार करने की क्षमता भी मेरे अंदर है।” इन अफ़र्मेशन्स को दिन में कई बार दोहराएं, विशेषकर तब जब तनाव महसूस हो। उन्हें लिखें, उन्हें आवाज़ दें-यह आपकी आंतरिक आवाज़ को पुनः प्रोग्राम करेगा।
लेकिन केवल तकनीकें ही पर्याप्त नहीं हैं। आपकी मानसिक शांति के लिए शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना होगा। क्या आपने कभी माइंडफुलनेस का अभ्यास किया है? यह केवल ध्यान नहीं है-यह वर्तमान क्षण में पूरी तरह मौजूद होना है। दिन में केवल पांच मिनट के लिए, बिना किसी निर्णय के, अपने सांसों पर ध्यान दें। जब दबाव महसूस हो, तो अपने शरीर में तनाव के संकेतों को पहचानें-कसी हुई मांसपेशियां, तेज़ सांसें-और उन्हें जागरूकता से छोड़ने दें। यह अभ्यास आपको यह एहसास दिलाएगा कि आप तनाव और स्वयं के बीच एक अंतराल पैदा कर सकती हैं।
आपके बच्चों की किशोरावस्था की चिंताएं भी आपकी शांति को प्रभावित कर रही हैं। यहाँ याद रखें कि मातृत्व का अर्थ है मार्गदर्शन, नहीं नियंत्रण। उनके साथ खुले संवाद की जगह बनाएं जहाँ वे बिना डरे अपनी भावनाएं साझा कर सकें। लेकिन साथ ही, उनकी समस्याओं को अपने ऊपर न लें। उनकी यात्रा उनकी है-आप केवल उन्हें सुरक्षित स्थान दे सकती हैं जहाँ वे गिरकर फिर खड़े हो सकें। जब आप स्वयं को उनकी समस्याओं से अलग करेंगी, तो आपकी भावनात्मक ऊर्जा भी मुक्त होगी।
अंत में, स्वयं को पुनः खोजने का अर्थ है नई पहचानें बनाना-वह पहचान जो केवल आपकी हो, न कि दूसरों की अपेक्षाओं पर आधारित। क्या आपने कभी किसी रचनात्मक गतिविधि में समय बिताया है-चाहे वह लिखना हो, बागवानी हो, या कोई पुराना शौक फिर से शुरू करना? ये गतिविधियाँ आपकी आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकती हैं। या फिर, क्या आप किसी नए कौशल को सीखना चाहेंगी? उम्र कभी सीखने की बाधा नहीं होती-वह तो केवल एक संख्या है। जब आप स्वयं के लिए समय निकालेंगी, तो पाएंगी कि आपकी आत्म-सम्मान की भावना स्वतः मजबूत हो रही है।
और सबसे महत्वपूर्ण: दया रखें-खुद पर। आपने इतना कुछ हासिल किया है, और अभी भी कर रही हैं। जब भी स्वयं पर सवाल उठें, तो खुद से पूछें: क्या मैं अपने किसी प्रियजन से इतनी कठोर अपेक्षाएँ रखती जैसी स्वयं से रखती हूँ? शायद नहीं। तो फिर स्वयं के प्रति भी वही दया, वही धैर्य रखें। क्योंकि आत्मविश्वास और शांति की यात्रा किसी गंतव्य तक पहुँचने की नहीं है-यह तो हर कदम पर स्वयं को गले लगाने की कला है।